Section 25 of The Supreme Court Judges (Salaries and Conditions of Service) Act, 1958 in hindi
व्यावृत्तियां
इस अधिनियम की किसी बात का ऐसा प्रभाव नहीं होगा जिससे कि किसी न्यायाधीश को, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ पर न्यायाधीश के रूप में सेवा कर रहा है, उसकी अनुपस्थिति छुट्टी की बावत विशेषाधिकारों और भत्तों या उसके अधिकारों (जिनके अंतर्गत छुट्टी-भत्ते भी हैं) या पेंशन के लिए उन निबंधनों की अपेक्षा कम अनुकूल हों जिनके लिए वह हकदार होता यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता ।
अनुसूची (धारा 3 और 4 देखिए) न्यायाधीशों की पेंशनें भाग
अ।. इस भाग के उपबंध ऐसे न्यायाधीश को, जो संघ या किसी राज्य के अधीन किसी अन्य पेंशन योग्य पद पर नहीं रहा है, लायू होंगे और ऐसे व्यक्ति को भी, जो 20 मई, 954 को न्यायाधीश के रूप में सेवा में था और ऐसे न्यायाधीश को, जिसने संघ या राज्य के अधीन किसी अन्य पेंशन योग्य पद पर रहते हुए इस भाग के अधीन संदेय पेंशन लेने का चयन किया है, लागू होंगे ।]
2. इस भाग के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे मुख्य न्यायाधिपति को, जिसे यह भाग लायू होता है +* * * संदेय पेंशन की रकम वह होगी जो निम्नलिखित रकमों के योग के बराबर हो, अर्थात्--
(क) उस पेंशन के बराबर रकम, जो उसे उच्च न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) अधिनियम, 954 (954 का 28) की प्रथम अनुसूची के भाग | में दिए गए मापमान और उपबंधों के अनुसार संदेय होती यदि वह सेवा न्यायाधीश के रूप में किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा होती;
(ख) उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति के रूप में सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष के लिए 5[चौंतीस हजार एक सौ चार रुपए] प्रति वर्ष की अतिरिक्त रकम, जब तक कि वह “[दस लाख चौंतीस हजार चालीस रुपए] प्रति वर्ष की पेंशन
1206 के अधिनियम सं० ]3 की धारा 27 द्वारा अंतःस्थापित ।
2 1976 के अधिनियम सं ० 36 की धारा 5 द्वारा (-0-974 से) उपधारा (3) के स्थान पर प्रतिस्थापित । 3 1206 के अधिनियम सं ० 3 की धारा 28 द्वारा प्रतिस्थापित ।
4 2005 के अधिनियम सं ० 46 की धारा ] द्वारा लोप किया गया ।
- 1208 के अधिनियम सं ० ]0 की धारा 9 द्वारा प्रतिस्थापित । पाने का हकदार नहीं हो जाता, और उसके पश्चात् ऐसी सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष के लिए '[छियासी हजार आठ सौ चौरासी रुपए] की अतिरिक्त रकम: परंतु उसकी पेंशन की कुल रकम किसी भी दशा में '[सोलह लाख अस्सी हजार रुपए] प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी । 3. किसी अन्य न्यायाधीश को, जिसे यह भाग लागू होता है, “*** संदेय पेंशन वह रकम होगी जो उस पेंशन के बराबर हो जो उसे उच्च न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) अधिनियम, 954 (954 का 28) की प्रथम अनुसूची के भाग । के मापमान और उपबंधों के अनुसार संदेय होती यदि वह सेवा न्यायाधीश के रूप में किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा होती : अूपरन्तु इस पैरा के अधीन पेंशन किसी भी दशा में ' [पंद्रह लाख रुपए] प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी ।] 4. यदि उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश, जिसने उसके कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति के रूप में सेवा की है, तत्पश्चात् उसका मुख्य न्यायाधिपति नियुक्त हो जाता है तो कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति के रूप में उसकी सेवा, इस भाग के पैरा 2 के प्रयोजनों के लिए मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा मानी जाएगी ।] 2% क कः क क व कः क क के डक कः कः कः क भाग 3 . इस भाग के उपबंध ऐसे न्यायाधीश को लागू होंगे जो संघ या राज्य के अधीन किसी [पेंशन योग्य पद] पर रहा है (किन्तु भारतीय सिविल सेवा का सदस्य नहीं है) और जिसने भाग । के अधीन संदेय पेंशन लेने का चयन नहीं किया है । 2. ऐसे न्यायाधीश को संदेय पेंशन,-- (क) वह पेंशन होगी, जिसके लिए वह, यदि वह न्यायाधीश के रूप में नियुक्त न किया गया होता तो, अपनी सेवा के साधारण नियमों के अधीन हकदार है और भारत में न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा उस पेंशन की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए उसमें की गई सेवा समझी जाएगी ; और (ख) पेंशन के लिए भारत में न्यायाधीश के रूप में सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष की बाबत '[पैंतालीस हजार सोलह रुपए] वार्षिक की विशेष अतिरिक्त पेंशन होगी *** [परंतु खंड (क) के अधीन पेंशन और खंड (ख) के अधीन अतिरिक्त पेंशन, एक साथ मिलकर किसी भी दशा में, किसी मुख्य न्यायाधिपति की दशा में '[सोलह लाख अस्सी हजार रुपए] प्रतिवर्ष और किसी अन्य न्यायाधीश की दशा में ' [पंद्रह लाख रुपए] प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी ।] तल क क क जि ' 1208 के अधिनियम सं ० 0 की धारा 9 द्वारा प्रतिस्थापित । 2 2005 के अधिनियम सं ० 46 की धारा ] द्वारा लोप किया गया । 3 |1988 के अधिनियम सं ० 20 की धारा 7 द्वारा (--986 से) जोड़ा गया ।
- |1988 के अधिनियम सं ० 20 की धारा 7 द्वारा (--986 से) पैरा 6 और 7 का लोप किया गया | 5 1206 के अधिनियम सं ० 3 की धारा 28 द्वारा लोप किया गया । 5 ।1980 के अधिनियम सं ० 57 की धारा 9 द्वारा (भूतलक्षी रूप से) “पेंशन योग्य सिविल पद” के स्थान पर प्रतिस्थापित । 7 ]1999 के अधिनियम सं० 7 की धारा द्वारा (।--996 से) कतिपय शब्दों का लोप किया गया ।
- 1988 के अधिनियम सं० 20 की धारा 7 द्वारा (--986 से) परन्तुक के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- [1988 के अधिनियम सं ० 20 की धारा 7 द्वारा (--986 से) पैरा 3 और 4 का लोप किया गया ।