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Section 9A of The Companies (Profits) Surtax Act, 1964 in hindi
- (1)यदि [निर्धारण अधिकारी] का किसी निर्धारण वर्ष के लिए नियमित निर्धारण से सम्बन्धित कार्यवाहियों के दौरान समाधान हो जाता है कि-- (क) किसी निर्धारिती ने अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के अधीन ऐसा कथन दिया है जिसके बारे में वह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि वह मिथ्या है, अथवा (ख) कोई निर्धारिती अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के उपबन्धों के अनुसार कथन देने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहा है,
' ।1988 के अधिनियम सं ० 4 की धारा 87 द्वारा (-4-988 से) “आय-कर अधिकारी” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
2 1984 के अधिनियम सं० 67 की धारा 77 द्वारा (-0-984 से) “बारह प्रतिशत” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
3 |1974 के अधिनियम सं ० 26 की धारा 20 द्वारा (भूतलक्षी रूप से) “संदेव अतिकर” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
4 |1988 के अधिनियम सं ० 4 की धारा 87 द्वारा (।-4-988 से) “सहायक आयुक्त (निरीक्षण) के स्थान पर प्रतिस्थापित । 5 98] के अधिनियम सं० 6 की धारा 37 द्वारा (-4-98 से) अंत:स्थापित ।
प्र तो वह निदेश दे सकेगा कि ऐसा निर्धारिती अपने द्वारा संदेय अतिकर की रकम के अतिरिक्त, यदि कोई हो, शास्ति के रूप में ऐसी राशि संदत्त करेगा,--
- (1)जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट दशा में, उतनी रकम के दस प्रतिशत से कम किन्तु ड्योढ़े से अधिक न होगी, जितनी से निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान धारा 7क के उपबन्धों के अधीन वस्तुत: संदत्त अतिकर निम्नलिखित में से जो भी कम हो, उससे कम पड़ता है अर्थात् :--
- (1)निर्धारित अतिकर का तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत, अथवा
- (2)वह रकम जो अग्रिम अतिकर के रूप में संदेय होती, यदि निर्धारिती ने धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के उपबन्धों के अनुसार सही और पूर्ण कथन दिया होता ;
- (1)जो खण्ड (ख) में निर्दिष्ट दशा में, निर्धारित अतिकर के दस प्रतिशत से कम और तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत के ड्योढ़े से अधिक नहीं होगी ।
- (2)यदि [निर्धारण अधिकारी] का किसी निर्धारण वर्ष के लिए नियमित निर्धारण से सम्बन्धित किन्हीं कार्यवाहियों के दौरान यह समाधान हो जाता है कि-- (क) किसी निर्धारिती ने अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (ख) या उपधारा
- (6)या उपधारा (7) या उपधारा (9) के अधीन ऐसा प्राक्कलन दिया है जिसके बारे में वह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि वह मिथ्या है, अथवा (ख) किसी निर्धारिती ने अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (8) के अधीन ऐसा प्राक्कलन दिया है जिसके बारे में वह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि वह मिथ्या है, अथवा (ग) कोई निर्धारिती अपने द्वारा संदेय अग़िम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (ख) के उपबन्धों के अनुसार प्राक्कलन देने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहा है, अथवा (घ) कोई निर्धारिती अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (8) के उपबन्धों के अनुसार प्राक्कलन देने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहा है, तो वह यह निदेश दे सकेगा कि वह व्यक्ति अपने द्वारा संदेय अतिकर की रकम के, यदि कोई हो, अतिरिक्त, शास्ति के रूप में ऐसी राशि संदत्त करेगा,--
- (1)जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट दशा में, उतनी रकम के दस प्रतिशत से कम और ड्योढ़े से अधिक न होगी, जितनी से निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान धारा 7क के उपबंधों के अधीन वस्तुत: संदत्त अतिकर, निम्नलिखित में से जो भी कम हो उससे कम पड़ता है, अर्थात् :--
- (1)निर्धारित अतिकर का तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत, अथवा
- (2)जहां निर्धारिती द्वारा धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के अधीन कथन दिया गया था, ऐसे कथन के अधीन संदेय रकम ;
- (1)जो खण्ड (ख) में निर्दिष्ट दशा में, उतनी रकम के दस प्रतिशत से कम किन्तु ड्योढ़े से अधिक न होगी जितनी से निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान धारा 7क के उपबन्धों के अधीन वस्तुत: संदत्त अतिकर, निर्धारित अतिकर के तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत से कम पड़ता है ; (ऐ) जो खण्ड (ग) में निर्दिष्ट दशा में, दस प्रतिशत से कम नहीं होगी किन्तु निर्धारित अतिकर के तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत के ड्योढ़े से अधिक नहीं होगी ; और (४) जो खण्ड (घ) में निर्दिष्ट दशा में, उतनी रकम के दस प्रतिशत से कम किन्तु ड्योढ़े से अधिक नहीं होगी जितनी से धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के अधीन कथन या खण्ड (ख) के अधीन प्राक्कलन या उक्त धारा की उपधारा (6) के अधीन कथन के बदले प्राक्कलन के अनुसार संदेय अतिकर की रकम, निर्धारित अतिकर के तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत से कम पड़ती है । स्पष्टीकरण--“[मुख्य आयुक्त या आयुक्त] ने, आय-कर अधिनियम की धारा 209क की उपधारा (4) के प्रथम परन्तुक या धारा 22 की उपधारा (3क) के प्रथम परन्तुक द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में, यथास्थिति, उक्त उपधारा (4) या उक्त उपधारा (3क) में निर्दिष्ट प्राककलन देने की तारीख बढ़ा दी है और इस प्रकार बढ़ाई गई तारीख उस निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के बाद पड़ती है तो इस प्रकार विस्तारित तारीख को या उसके पूर्व निर्धारिती द्वारा संदत्त अतिकर की रकम उपधारा (2) के खण्ड (॥) के प्रयोजनों के लिए भी उस वित्तीय वर्ष के दौरान वास्तव में संदत्त अतिकर की रकम समझी जाएगी ।] ' |1988 के अधिनियम सं ० 4 की धारा 87 द्वारा (-4-988 से) “आय-कर अधिकारी” के स्थान पर प्रतिस्थापित । 2 1988 के अधिनियम सं ० 4 की धारा 87 द्वारा (-4-988 से) “आयुक्त” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।