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Section 33 of The National Institute of Mental Health and Neuro-Sciences, Bangalore Act, 2012 in hindi
कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति ।
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर अधिनियम, 202 (1202 का अधिनियम संख्यांक 38) [3 सितंबर, 202] राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर नामक संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने और उसके निगमन तथा उससे संबंधित विषयों का उपबंध करने के लिए अधिनियम भारत गणराज्य के तिरसख्वें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-- अध्याय प्रारम्भिक . संक्षिप्त नाम और प्रारंभ--(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर अधिनियम, 202 है ।
- (2)यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे । 2. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया जाना--राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर के उद्देश्य ऐसे हैं, जो उसे एक राष्ट्रीय महत्व की संस्था बनाते हैं, अतः, यह घोषित किया जाता है कि राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर राष्ट्रीय महत्व की एक संस्था है । 3. परिभाषाएं--इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ में अन्यथा अपेक्षित न हो,-- (क) “निधि” से धारा 7 में निर्दिष्ट संस्थान की निधि अभिप्रेत है; (ख) “शासी निकाय” से संस्थान का शासी निकाय अभिप्रेत है; (ग) “संस्थान” से इस अधिनियम के अधीन निगमित राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर नामक संस्था अभिप्रेत है; (घ) “सदस्य” से संस्थान का सदस्य अभिप्रेत है; (ड) “विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; (च) “विनिर्दिष्ट” से इस अधिनियम के अधीन विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट अभिप्रेत है । 4. संस्थान का निगमन--राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर को, जो कर्नाटक सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 960 (960 का कर्नाटक अधिनियम सं० 7) के अधीन 27 दिसंबर, 974 को रजिस्ट्रीकृत एक संस्थान है, पूर्वोक्त नाम से एक निगमित निकाय गठित किया जाता है और उस निगमित निकाय के रूप में उसका शाश्वत् उत्ताधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने तथा संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा । 5. संस्थान की संरचना--(1) संस्थान में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्:-- (क) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री, पदेन; (ख) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री (आयुर्विज्ञान शिक्षा), कर्नाटक सरकार, पदेन; (ग) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय या विभाग में सचिव, भारत सरकार, पदेन; (घ) संस्थान का निदेशक, पदेन; (ड) व्यय विभाग, वित्त मंत्रालय में सचिव, भारत सरकार या उसका नामनिर्देशिती (जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो), पदेन; (च) उच्चतर शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय में सचिव, भारत सरकार या उसका नामनिर्देशिती (जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो), पदेन; (छ) महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवा, भारत सरकार, पदेन; (ज) कुलपति, राजीव गांधी स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय, कर्नाटक, पदेन; (झ) मुख्य सचिव, कर्नाटक सरकार या उसका नामनिर्देशिती, जो उस सरकार में सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो; (अ) सात व्यक्ति, जिनमें से एक व्यक्ति भारतीय विज्ञान कांग्रेस एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व करने वाला गैर- चिकित्सा वैज्ञानिक होगा और किसी विश्वविद्यालय से जैविक, व्यावहारिक और भौतिक विज्ञान के क्षेत्र का एक-एक ख्यातिप्राप्त व्यक्ति होगा, जिसे केंद्रीय सरकार द्वारा ऐसी रीति में नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, जो विहित की जाए; (ट) भारतीय विश्वविद्यालयों के आयुर्विज्ञान संकायों के चार प्रतिनिधि, जिनमें से एक व्यक्ति राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान से होगा, जिसे केंद्रीय सरकार द्वारा ऐसी रीति में नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, जो विहित की जाए; (ठ) तीन संसद् सदस्य, जिनमें से दो सदस्य लोक सभा सदस्यों द्वारा अपने में से और एक सदस्य राज्य सभा सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे ।
- (2)इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि संस्थान के सदस्य का पद उसके धारक को संसद् के किसी भी सदन का सदस्य चुने जाने या होने से निररहित नहीं करेगा । 6. सदस्यों की पदावधि और रिक्तियां--(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, किसी सदस्य की पदावधि उसके नामनिर्देशन या निर्वाचन की तारीख से पांच वर्ष की होगी ।
- (2)धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (ठ) के अधीन निर्वाचित किसी सदस्य की पदावधि, जैसे ही वह मंत्री या राज्य मंत्री या उप मंत्री या लोक सभा का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष या राज्य सभा का सभापति या उप सभापति बनता है या उस सदन का जिससे वह निर्वाचित हुआ था, सदस्य नहीं रहता है, उसी क्षण समाप्त हो जाएगी ।
- (3)पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी, जब तक वह उस पद को, जिसके आधार पर वह ऐसा सदस्य है, धारण किए रहता है ।
- (4)किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए, नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित किसी सदस्य की पदावधि, उस सदस्य की शेष पदावधि तक बनी रहेगी, जिसके स्थान पर वह नामनिर्देशित या निर्वाचित हुआ है ।
- (5)धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (ठ) के अधीन निर्वाचित किसी सदस्य से भिन्न कोई पद छोड़ने वाला सदस्य, उसके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट किए जाने तक या तीन मास की अवधि के लिए, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पद पर बना रहेगा: परंतु केन्द्रीय सरकार पद छोड़ने वाले सदस्य के स्थान पर किसी सदस्य को तीन मास की उक्त अवधि के भीतर नामनिर्देशित करेगी ।
- (6)पद छोड़ने वाला कोई सदस्य पुन: नामनिर्देशन या पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र होगा ।
- (7)कोई सदस्य केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा, किंतु वह उस सरकार द्वारा उसका त्यागपत्र स्वीकार किए जाने तक पद बना रहेगा ।
- (8)सदस्यों के बीच रिक्तियां भरे जाने की रीति वह होगी, जो विहित की जाए । 7. अध्यक्ष की शक्तियां और कृत्य--(1) संस्थान का एक अध्यक्ष होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्थान के निदेशक से भिन्न सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ।
- (2)अध्यक्ष ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो इस अधिनियम में अधिकथित किए गए हैं या जो विहित किए जाएं । 8. संस्थान का उपाध्यक्ष--संस्थान का एक उपाध्यक्ष होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्थान के निदेशक से भिन्न सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा । 9. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों के भत्ते--अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य संस्थान से ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे, जो विहित किए जाएं । 0. संस्थान की बैठकें--संस्थान अपनी पहली बैठक ऐसे समय और स्थान पर करेगा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियत किया जाए और पहली बैठक में कारबार के संव्यवहार के संबंध में ऐसे प्रक्रिया नियमों का पालन करेगा, जो उस सरकार द्वारा अधिकथित किए जाएं तथा तत्पश्चात् संस्थान ऐसे समयों और स्थानों पर अपनी बैठकें करेगा और अपनी बैठकों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में ऐसे प्रक्रिया नियमों का पालन करेगा, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं । . संस्थान का शासी निकाय और अन्य समितियां--(1) संस्थान का एक शासी निकाय होगा जो संस्थान द्वारा ऐसी रीति में गठित किया जाएगा, जो विनिर्दिष्ट की जाए: परंतु उन व्यक्तियों की संख्या, जो संस्थान के सदस्य नहीं हैं, शासी निकाय की कुल सदस्यता के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी ।
- (2)शासी निकाय संस्थान की कार्यपालिका समिति होगा और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो संस्थान इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।
- (3)संस्थान का अध्यक्ष शासी निकाय का सभापति होगा और उसके सभापति के रूप में वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्य का निर्वहन करेगा, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
- (4)शासी निकाय द्वारा अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया और शासी निकाय के सदस्यों की पदावधि तथा उनकी रिक्तियां भरे जाने की रीति ऐसी होगी जो विनिर्दिप्ट की जाए ।
- (5)संस्थान, ऐसे नियंत्रण और निर्बंधनों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, उतनी स्थायी समितियां और उतनी तदर्थ समितियां गठित कर सकेगा, जितनी वह संस्थान की किसी शक्ति का प्रयोग करने या उसके किसी कृत्य का निर्वहन करने के लिए या किसी ऐसे विषय में, जो संस्थान उन्हें निर्दिष्ट करे, जांच करने या उस पर रिपोर्ट करने या सलाह देने के लिए ठीक समझे ।
- (6)शासी निकाय का सभापति और उसके सदस्य तथा किसी स्थायी समिति या तदूर्थ समिति का सभापति और उसके सदस्य ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे जो विनिर्दिष्ट किए जाएं । 2. संस्थान के कर्मचारिवृन्द--(1) संस्थान का एक मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा, जिसे संस्थान के निदेशक के रूप में पदाभिहित किया जाएगा और उसकी नियुक्ति, ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, संस्थान द्वारा की जाएगी : परंतु संस्थान के प्रथम निदेशक की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी ।
- (2)निदेशक, उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए या पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पद धारण करेगा ।
- (3)निदेशक संस्थान और शासी निकाय के सचिव के रूप में कार्य करेगा ।
- (4)निदेशक ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा जो विनिर्दिष्ट किए जाएं या जो उसे संस्थान या संस्थान के अध्यक्ष या शासी निकाय या शासी निकाय के सभापति द्वारा प्रत्यायोजित किए जाएं ।
- (5)संस्थान, ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, उतने अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा, जितने उसकी शक्तियों के प्रयोग और उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हों और ऐसे अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों के पदनाम और उनकी श्रेणियां वे होंगी, जो विनिर्दिष्ट की जाएं ।
- (6)ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, संस्थान का निदेशक और अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी ऐसे वेतन और भत्तों के हकदार होंगे और छुट्टी, पेंशन, भविष्य निधि तथा अन्य मामलों के संबंध में सेवा की ऐसी शर्तों द्वारा शासित होंगे, जो विनिर्दिष्ट की जाएं । 3. संस्थान के उद्देश्य--संस्थान के उद्देश्य निम्नलिखित होंगे:-- (क) पूर्व-स्नातक और स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा की सभी शाखाओं में, मानसिक स्वास्थ्य, तंत्रिका-विज्ञानों और संबद्ध विशिष्ट विषयों पर विशेष ध्यान देते हुए अध्यापन के पैटर्न का विकास करना, जिससे आयुर्विज्ञान शिक्षा के उच्च स्तर का निरूपण किया जा सके ; (ख) स्वास्थ्य क्रियाकलापों की सभी महत्वपूर्ण शाखाओं में कार्मिकों के प्रशिक्षण के लिए उच्चतम श्रेणी की शिक्षा सुविधाओं को, जहां तक हो सके, एक साथ एक स्थान पर लाना ; (ग) विशेषज्ञों और चिकित्सा शिक्षकों की, विशेष रूप से मानसिक स्वास्थ्य, तंत्रिका-विज्ञानों और संबद्ध विशिष्ट विषयों के क्षेत्र में, देश की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना ; (घ) मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञानों के क्षेत्र में उन्नत सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए नैदानिक और व्यापक चिकित्सीय सेवा सुविधाएं प्रदान करने के लिए नवीन युक्तियों का विकास करना ; (ड) मानसिक स्वास्थ्य, तंत्रिका-विज्ञानों तथा संबद्ध विशिष्ट विषयों के क्षेत्र में गहन अध्ययन और अनुसंधान करना ; 4. संस्थान के कृत्य--धारा 3 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों के संवर्धन को ध्यान में रखते हुए संस्थान,-- (क) आधुनिक औषध विज्ञान और अन्य संबद्ध विज्ञानों में, जिनके अंतर्गत भौतिक और जैविक विज्ञान भी हैं, पूर्व- स्नातक और स्नातकोत्तर अध्यापन के लिए उपबंध कर सकेगा ; (ख) ऐसे विज्ञानों की विभिन्न शाखाओं में अनुसंधान के लिए सुविधाएं उपलब्ध करा सकेगा ; (ग) मानव विज्ञान के अध्यापन के लिए उपबंध कर सकेगा ; (घ) आयुर्विज्ञान शिक्षा, पूर्व-स्नातक और स्नातकोत्तर, दोनों, की नई पद्धतियों में, ऐसी शिक्षा का उच्च स्तर प्राप्त करने के लिए, प्रयोगों का संचालन कर सकेगा ; (ड) पूर्व-स्नातक और स्नातकोत्तर, दोनों, अध्ययनों के लिए पाठ्यक्रम और विशेष पाठ्यक्रम विनिर्दिष्ट कर सकेगा ; (च) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, निम्नलिखित की स्थापना कर सकेगा और उन्हें चला सकेगा :--
- (1)विभिन्न विषयों में शिक्षा प्रदान करने और अनुसंधान करने के लिए कर्मचारिवृंद और आवश्यक साज- सामान से सुसज्जित विभिन्न विभागों वाली एक या अधिक आयुर्विज्ञान संस्थाएं;
- (1)नैदानिक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक साज-सामान से सुसज्जित एक या अधिक अस्पताल;
- (1)नसों के प्रक्षिक्षण के लिए कर्मचारिवूंद और आवश्यक साज-सामान से सुसज्जित निर्सिंग महाविद्यालय; (४) ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य केन्द्र, जो संस्थान के चिकित्सा और नर्सिंग छात्रों के फील्ड प्रशिक्षण के लिए केंद्रों के रूप में होंगे; और (४) विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य कर्मकारों जैसे कि भौतिक चिकित्साविद्, व्यवसाय चिकित्सक और विभिन्न प्रकार के चिकित्सा तकनीशियनों के प्रशिक्षण के लिए अन्य संस्थाएं; (छ) भारत में विभिन्न आयुर्विज्ञान महाविद्यालयों के शिक्षकों को प्रशिक्षित कर सकेगा ; (ज) पूर्व-स्नातक और स्नातकोत्तर चिकित्सा, नर्सिंग और संबद्ध विशिष्ट विषयों की शिक्षा में परीक्षाएं आयोजित कर सकेगा और ऐसी डिग्ियां, डिप्लोमे और अन्य विद्या संबंधी सम्मान तथा उपाधियां प्रदान कर सकेगा, जो विनियमों में अधिकथित किए जाएं; (झ) विनियमों के अनुसार आचार्यों, उपाचार्यों, प्राध्यापकों के रूप में और अन्य प्रकार के पदों पर व्यक्तियों को प्रतिष्ठित और नियुक्त कर सकेगा; (अ) सरकार से अनुदान और, यथास्थिति, दाताओं, हिताधिकारियों, वसीयतकर्ताओं या अंतरकों से जंगम और स्थावर, दोनों प्रकार की, संपत्तियों के दान, संदान, उपकृतियां, वसीयतें और अंतरण प्राप्त कर सकेगा; (ट) संस्थान की या उसमें निहित ऐसी किसी संपत्ति के संबंध में ऐसी किसी रीति में व्यवहार कर सकेगा, जो धारा 2 में विनिर्दिप्ट उद्देश्यों का संवर्धन करने के लिए आवश्यक समझी जाती है;
- (5)केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से ऐसी फीस और अन्य प्रभारों की मांग कर सकेगा और उन्हें प्राप्त कर सकेगा, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं; (ड) अपने कर्मचारिवूंद के लिए क्वार्टरों का निर्माण कर सकेगा और ऐसे विनियमों के अनुसार, जो इस निमित्त बनाए जाएं, कर्मचारिवूंद को ऐसे क्वार्टर आवंटित कर सकेगा; (ढ) केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से संस्थान की संपत्ति की प्रतिभूति पर धन उधार ले सकेगा; (ण) ऐसे सभी अन्य कार्य और बातें कर सकेगा, जो धारा 3 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए आवश्यक हों । 5. संपत्ति का निहित होना--(1) कर्नाटक सोसाइटी रजिस्ट्री करण अधिनियम, 960 (960 का कर्नाटक अधिनियम सं ० ।7) के अधीन रजिस्ट्रीकृत राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर की संपत्तियां इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख को संस्थान में निहित हो जाएंगी ।
- (2)संस्थान की सभी आय और संपत्ति को इस अधिनियम में यथा उपवर्णित उसके उद्देश्यों के संवर्धन के संबंध में उपयोजित किया जाएगा ।
- (3)संस्थान की आय और संपत्ति का कोई भी भाग ऐसे व्यक्तियों को, जो संस्थान के सदस्य हैं या किसी समय सदस्य रहे हैं, प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से, लाभ के रूप में संदत्त या अंतरित नहीं किया जाएगा : परंतु इसमें अंतर्विष्ट कोई बात संस्थान को दी गई सेवाओं के लिए उसके किसी सदस्य या अन्य व्यक्तियों को पारिश्रमिक और अन्य भत्तों के संदाय से निवारित नहीं करेगी । 6. संस्थान को संदाय--केंद्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में संस्थान को, ऐसी धनराशियों का और ऐसी रीति में, जो इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग और कृत्यों के निर्वहन के लिए उस सरकार द्वारा आवश्यक समझी जाएं, संदाय कर सकेगी । 7. संस्थान की निधि--(1) संस्थान, एक निधि रखेगा, जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे,-- (क) केंद्रीय सरकार और कर्नाटक राज्य सरकार द्वारा दी गई सभी धनराशियां ; (ख) संस्थान द्वारा प्राप्त सभी फीसें और अन्य प्रभार; (ग) संस्थान द्वारा अनुदानों, दानों, संदानों, उपकृतियों, वसीयतों या अंतरणों के रूप में प्राप्त सभी धनराशियां; और (घ) संस्थान द्वारा किसी अन्य रीति या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त सभी धनराशियां ।
- (2)निधि में जमा की गई सभी धनराशियां ऐसे बैंकों में जमा या ऐसी रीति में विनिहित की जाएंगी, जो संस्था न, केंद्रीय सरकार के अनुमोदन से, विनिशिचत करे ।
- (3)निधि का उपयोग संस्थान के व्ययों की, जिसके अंतर्गत धारा 4 के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग और उसके कृत्यों के निर्वहन में उपगत व्यय भी हैं, पूर्ति के मद्दे किया जाएगा । 8. संस्थान का बजट--संस्थान, प्रत्येक वर्ष, ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर ठीक आगामी वित्तीय वर्ष की बाबत संस्थान की अनुमानित प्राप्तियां और व्यय दर्शित करते हुए एक बजट तैयार करेगा और उसकी उतनी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित करेगा, जितनी विहित की जाएं । 9. लेखा और संपरीक्षा--(!) संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलनपत्र भी है, ऐसे प्ररूप में, जो केंद्रीय सरकार विहित करे, और ऐसे साधारण निदेशों के अनुसार, जो उस सरकार द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरी क्षक के परामर्श से जारी किए जाएं, तैयार करेगा ।
- (2)संस्थान के लेखाओं की संपरी क्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरी क्षक द्वारा की जाएगी और उस संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा उपगत कोई व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
- (3)भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के उस संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे, जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और उसे विशिष्ट रूप से बहियां, लेखे, संबंधित वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागज-पत्र पेश किए जाने की मांग करने तथा संस्थान और उसके द्वारा स्थापित तथा चलाई जा रही संस्थाओं के कार्यालयों का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
- (4)भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथा प्रमाणित संस्थान के लेखे, उनकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ, हर वर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी । 20. वार्षिक रिपोर्ट--संस्थान प्रत्येक वर्ष के लिए उस वर्ष के दौरान के अपने कार्यकलापों की एक रिपोर्ट तैयार करेगा और रिपोर्ट को ऐसे प्ररूप में और उस तारीख को या उसके पूर्व, जो विहित की जाए, केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा तथा इस रिपोर्ट की 'एक प्रति, उसकी प्राप्ति के एक मास के भीतर, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी । 2. पेंशन और भविष्य निधियां--(1) संस्थान अपने अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के फायदे के लिए, ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसी पेंशन और भविष्य निधियों का गठन करेगा, जो वह ठीक समझे ।
- (2)जहां किसी ऐसी पेंशन या भविष्य निधि का गठन किया गया है, वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषणा कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनिम, ।925 (925 का 9) के उपबंध उस निधि को इस प्रकार लायू होंगे मानो कि वह कोई सरकारी भविष्य निधि हो । 22. संस्थान के आदेशों और लिखतों का अधिप्रमाणन--संस्थान के सभी आदेश और विनिश्चय निदेशक या संस्थान द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य द्वारा अधिप्रमाणित किए जाएंगे और सभी अन्य लिखतों को निदेशक या उन अधिकारियों के, जो संस्थान द्वारा प्राधिकृत किए जाएं, हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किया जाएगा । 23. कार्यों और कार्यवाहियों का रिक्तियों, आदि के कारण अविधिमान्य न होना--संस्थान, शासी निकाय या किसी स्थायी या तदर्थ समिति द्वारा इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी कार्य या की गई किसी कार्यवाही को केवल इस आधार पर प्रश्न गत नहीं किया जाएगा कि संस्थान, शासी निकाय या ऐसी स्थायी या तदर्थ समिति में कोई रिक्ति विद्यमान है या उसके गठन में कोई त्रुटि है । 24. संस्थान द्वारा आयुर्विज्ञान डिग्रियों, डिप्लोमाओं आदि का दिया जाना--तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को इस अधिनियम के अधीन आयुर्विज्ञान और नर्सिंग डिग्रियां, डिप्लोमे, प्रमाणपत्र और अन्य विद्या संबंधी सम्मान तथा उपाधियां प्रदान करने की शक्ति होगी । 25. संस्थान द्वारा प्रदान की गई आयुर्विज्ञान अहताओं की मान्यता--भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 956 (956 का 02), भारतीय पुनर्वास परिषद् अधिनियम, ।992 (992 का 34), भारतीय नर्सिंग परिषद् अधिनियम, ।947 (947 का 48) और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 956 (956 का 3) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन संस्थान द्वारा प्रदान की गई आयुर्विज्ञान डिग्रियां, डिप्लोमे, नर्सिंग डिग्रियां और प्रमाणपत्र पूर्वोक्त अधिनियमों के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त आयुर्विज्ञान अर्हताएं होंगी और संबंधित अधिनियमों की अनुसूची में सम्मिलित की गई समझी जाएंगी । 26. केन्द्रीय सरकार द्वारा नियंत्रण--संस्थान ऐसे निदेशों का पालन करेगा, जो इस अधिनियम के दक्ष प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे समय-समय पर जारी किए जाएं । 27. मतभेदों का समाधान--यदि इस अधिनियम के अधीन संस्थान द्वारा अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कृत्यों के निर्वहन में या उसके संबंध में संस्थान और केन्द्रीय सरकार के बीच कोई विवाद या मतभेद उत्पन्न होता है तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा । 28. विवरिणयां और सूचना--संस्थान, केन्द्रीय सरकार को ऐसी रिपोर्टे, विवरणियां और अन्य सूचना प्रस्तुत करेगा जिनकी वह सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे । 29. विद्यमान कर्मचारियों की सेवा का अंतरण--इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका-विज्ञान संस्थान, बंगलौर में नियोजित है, ऐसे प्रारम्भ से ही संस्थान का कर्मचारी हो जाएगा और उसमें उसी अवधि तक, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर तथा पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य-निधि और अन्य मामलों के संबंध में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ, अपना पद या सेवा धारण करेगा जो उसने, इस अधिनियम के पारित न किए जाने की दशा में इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को धारित किया होता और तब तक जब तक कि उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या ऐसी अवधि, पारिश्रमिक और निबंधनों तथा शर्तों को विनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दिया जाता, ऐसा करता रहेगा : परंतु किसी ऐसे व्यक्ति की पदावधि, पारिश्रमिक और सेवा के निबंधनों और शर्तों में, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा । 30. नियम बनाने की शक्ति--(!) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, संस्थान से परामर्श करके, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।
- (2)विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्:-- (क) धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (अ) और खंड (ट) के अधीन सदस्यों के नामनिर्देशन की रीति; (ख) धारा 6 की उपधारा (8) के अधीन सदस्यों की रिक्तियां भरने की रीति; (ग) धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन संस्थान के अध्यक्ष द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां और निर्वहन किए जाने वाले कृत्य; (घ) धारा 9 के अधीन संस्थान के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते; (ड) धारा ] की उपधारा (5) के अधीन स्थायी और तदर्थ समितियों के गठन के संबंध में नियंत्रण और निर्वंधन; (च) धारा 2 के अधीन संस्थान के निदेशक और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों की नियुक्ति तथा निदेशक और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें; (छ) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय, जिसके भीतर धारा 8 के अधीन संस्थान द्वारा बजट और रिपोर्टे तैयार की जाएंगी; (ज) धारा ।9 की उपधारा (1) के अधीन वार्षिक लेखा विवरण, जिसके अंतर्गत तुलन-पत्र भी है, का प्ररूप; (झ) धारा 20 के अधीन वार्षिक रिपोर्ट का प्ररूप; (अ) ऐसा कोई अन्य विषय, जिसे नियमों द्वारा विहित किया जाना है या जो विहित किया जाए । प्र 3. विनियम बनाने की शक्ति--(1) संस्थान, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत विनियम बना सकेगा और इस शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में, निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा,-- (क) धारा 0 के अधीन संस्थान की पहली बैठक से भिन्न बैठकें बुलाना और आयोजित करना, वह समय और स्थान, जहां ऐसी वैठकें आयोजित की जाएंगी और उन बैठकों में कारवार का संचालन; (ख) धारा । के अधीन शासी निकाय और स्थायी तथा तदर्थ समितियों का गठन करने की रीति तथा उनकी पदावधि तथा उनमें की रिक्तियों को भरने की रीति, सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते तथा शासी निकाय, स्थायी और तदर्थ समितियों द्वारा अपने कारबार के संचालन, उनकी शक्ति के प्रयोग, उनके कृत्यों के निर्वहन में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया; (ग) धारा 2 की उपधारा (4) के अधीन संस्थान के निदेशक की शक्तियां और कर्तव्य, उपधारा (5) के अधीन अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों के पदनाम नाम और उनकी श्रेणियां तथा उपधारा (6) के अधीन सेवा की अन्य शर्तें; (घ) धारा ।4 के अधीन निम्नलिखित विनिर्दिष्ट करने की संस्थान की शक्ति,--
- (1)खंड (ड) के अधीन पूर्व-स्नातक तथा स्नातकोत्तर शिक्षा के पाठ्यक्रम और विशेष पाठ्यक्रम; (॥) खंड (ज) के अधीन परीक्षाएं आयोजित करना और डिग्रियां, डिप्लोमे, प्रमाण्गपत्र और अन्य विद्या संबंधी सम्मान तथा उपाधियां प्रदान करना;
- (0)खंड (झ) के अधीन आचार्य पद, उपाचार्य पद, प्राध्यापक पद तथा अन्य ऐसे पद, जो संस्थित किए जा सकेंगे और ऐसे व्यक्ति, जो उन पदों पर नियुक्त किए जा सकेंगे; (९४) खंड (ट) और खंड (ड) के अधीन संस्थान की संपत्तियों का प्रबंध; (४) ऐसी फीस और अन्य प्रभार, जिनकी खंड (ठ) के अधीन संस्थान द्वारा मांग की जा सकेगी और जिन्हें प्राप्त किया जा सकेगा; (ड) वह रीति, जिसमें और वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए, धारा 2। की उपधारा (1) के अधीन संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों के फायदे के लिए पेंशन और भविष्य-निधि का गठन किया जा सकेगा; (च) ऐसा कोई अन्य विषय, जिसके लिए विनियमों द्वारा इस अधिनियम के अधीन उपबंध किया जा सकेगा ।
- (2)उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन प्रथम विनियम केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए जाएंगे और इस प्रकार बनाए गए किन्हीं विनियमों को संस्थान द्वारा उपधारा (1) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए परिवर्तित या विखंडित किया जा सकेगा । 32. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना--इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह नियम या विनियम निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा । 33. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति--(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित ऐसे आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक प्रतीत हों: परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
- (2)इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।