State · Puducherry
Section 32 of The Jawaharlal Institute of Post-Graduate Medical Education and Research, Puducherry, Act, 2008 in hindi
कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति ।
और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी अधिनियम, 2008 (2008 का अधिनियम संख्यांक 9) [6 मई, 2008] जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी नामक संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित करने के लिए तथा उसके निगमन और उससे संबंधित विषयों का उपबंध करने के लिए अधिनियम
भारत गणराज्य के उनसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:--
. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ--(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी अधिनियम, 2008 है ।
- (2)यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे । 2. जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी का राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में घोषित किया जाना--पुडुचेरी संघ राज्यक्षेत्र में जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी नामक संस्था के उद्देश्य ऐसे हैं जिनकी वजह से संस्था एक राष्ट्रीय महत्व की संस्था बन सकती है, अतः यह घोषित किया जाता है कि जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी नामक संस्था राष्ट्रीय महत्व की संस्था है । 3. परिभाषाएं--इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-- (क) “निधि” से धारा 6 में निर्दिष्ट संस्थान की निधि अभिप्रेत है; (ख) “शासी निकाय” से संस्थान का शासी निकाय अभिप्रेत है; (ग) “संस्थान” से इस अधिनियम के अधीन निगमित जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी नामक संस्था अभिप्रेत है; (घ) “सदस्य” से संस्थान का सदस्य अभिप्रेत है; (ड) “विहित” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; (च) “विनिर्दिष्ट” से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट अभिप्रेत है । 4. संस्थान का निगमन--जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी को जो संघ के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन कृत्यकारी संस्था है, पूर्वोक्त नाम का एक निगमित निकाय गठित किया जाता है और ऐसे निगमित निकाय के रूप में उसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की तथा संविदा करने की शक्ति होगी और वह उक्त नाम से वाद लाएगा तथा उस पर वाद लाया जाएगा । 5. संस्थान की संरचना--(1) संस्थान में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्:-- (क) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय या विभाग में भारत सरकार का सचिव--पदेन; (ख) पुडुचेरी विश्वविद्यालय का कुलपति--पदेन; (ग) डा० एम० जी० आर० आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, तमिलनाडु का कुलपति--पदेन; (घ) भारत सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं का महानिदेशक--पदेन; (ड) संस्थान का निदेशक--पदेन; (च) मुख्य सचिव, पुडुचेरी सरकार--पदेन; (छ) व्यय विभाग, वित्त मंत्रालय में भारत सरकार का सचिव या उसका नामनिर्देशिती (संयुक्त सचिव की पंक्ति से अन्यून)--पदेन; (ज) उच्चतर शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय में भारत सरकार का सचिव या उसका नामनिर्देशिती (संयुक्त सचिव की पंक्ति से अन्यून)--पदेन; (झ) केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी रीति में जो विहित की जाए, नामनिर्देशित किए जाने वाले सात व्यक्ति, जिनमें से इंडियन साइंस कांग्रेस एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व करने वाला एक ऐसा व्यक्ति होगा जो आयुर्विज्ञानी नहीं है; (अ) केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी रीति में जो विहित की जाए, नामनिर्देशित किए जाने वाले भारतीय विश्वविद्यालयों के आयुर्विज्ञान संकायों के चार प्रतिनिधि; और (ट) तीन संसद् सदस्य, जिनमें से दो लोक सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से और एक राज्य सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे ।
- (2)यह घोषित किया जाता है कि संस्थान के सदस्य का पद, उसके धारक को संसद् के किसी सदन का सदस्य चुने जाने या होने से निरहित नहीं करेगा । 6. सदस्यों की पदावधि और उनमें रिक्तियां--(1) इस धारा में, जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, सदस्य की पदावधि उसके नामनिर्देशन या निर्वाचन की तारीख से पांच वर्ष की होगी ।
- (2)धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (ट) के अधीन निर्वाचित सदस्य की पदावधि, जैसे ही वह मंत्री या राज्य मंत्री या उपमंत्री या लोक सभा का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अथवा राज्य सभा का उपसभापति बन जाता है या उस सदन का जिससे वह निर्वाचित किया गया था, सदस्य नहीं रह जाता है, समाप्त हो जाएगी ।
- (3)पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को धारण किए रहता है जिसके आधार पर वह ऐसा सदस्य है ।
- (4)आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्देशित या निर्वाचित सदस्य की पदावधि उस सदस्य की शेष पदावधि के लिए होगी, जिसके स्थान पर, वह नामनिर्देशित या निर्वाचित हुआ है ।
- (5)धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (ट) के अधीन निर्वाचित सदस्य से भिन्न पदावरोही सदस्य, तब तक जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति उसके स्थान पर सदस्य के रूप में नामनिर्देशित नहीं कर दिया जाता या तीन मास की अवधि के लिए, इनमें से जो भी पूर्वतर हो पद पर बना रहेगा : परन्तु केन्द्रीय सरकार, तीन मास की उक्त अवधि के भीतर किसी पदावरोही सदस्य के स्थान पर, किसी सदस्य को नामनिर्देशित करेगी ।
- (6)पदावरोही सदस्य पुनः नामनिर्देशन या पुनः निर्वाचन के लिए पात्र होगा ।
- (7)सदस्य केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा किन्तु वह अपने पद पर तब तक बना रहेगा जब तक कि सरकार उसका त्यागपत्र स्वीकार नहीं कर लेती ।
- (8)सदस्यों में रिक्तियां भरने की रीति वह होगी जो विहित की जाए । 7. संस्थान का सभापति, उसकी शक्तियां और कृत्य--(1) संस्थान का एक सभापति होगा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा संस्थान के निदेशक से भिन्न सदस्यों में से नामनिर्देशित किया जाएगा ।
- (2)सभापति, ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो इस अधिनियम में अधिकथित हैं या विहित किए जाएं । 8. सभापति और सदस्यों के भत्ते--सभापति और अन्य सदस्य संस्थान से ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे जो विहित किए जाएं । 9. संस्थान के अधिवेशन--संस्थान अपना पहला अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर करेगा, जिसे केन्द्रीय सरकार नियत करे और पहले अधिवेशन में कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो उस सरकार द्वारा अधिकथित किए जाएं; और तत्पश्चात् संस्थान ऐसे समय और स्थानों पर अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में, जिसके अंतर्गत गणपूर्ति भी है, प्रक्रिया के उन नियमों का, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं, पालन करेगा । 0. संस्थान का शासी-निकाय और अन्य समितियां--(1) संस्थान का एक शासी-निकाय होगा जिसका गठन संस्थान द्वारा ऐसी रीति से, जो विनिर्दिष्ट की जाए, किया जाएगा : परन्तु ऐसे व्यक्तियों की संख्या, जो संस्थान के सदस्य नहीं हैं, शासी-निकाय की कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी ।
- (2)शासी-निकाय, संस्थान की कार्यकारिणी समिति होगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगी जिन्हें संस्थान, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।
- (3)संस्थान का सभापति, शासी-निकाय का अध्यक्ष होगा और वह उसके अध्यक्ष के रूप में ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
- (4)शासी-निकाय द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों का निर्वहन करने में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया तथा शासी-निकाय के सदस्यों की पदावधि और उनमें रिक्तियों को भरने की रीति ऐसी होगी जो विनिर्दिष्ट की जाए ।
- (5)ऐसे नियंत्रण और निर्वंधनों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, संस्थान उतनी स्थायी समितियां और उतनी तदर्थ समितियां गठित कर सकेगा जितनी वह संस्थान की किसी शक्ति का प्रयोग या किसी कृत्य का निर्वहन करने के लिए या किसी ऐसे विषय में जो संस्थान उन्हें निर्दिष्ट करे, जांच करने अथवा उसके संबंध में रिपोर्ट या सलाह देने के लिए ठीक समझे ।
- (6)शासी निकाय के अध्यक्ष और सदस्य तथा स्थायी समिति या तदर्थ समिति के अध्यक्ष और सदस्य ऐसे भत्ते प्राप्त करेंगे जो विनिर्दिष्ट किए जाएं । . संस्थान के कर्मचारिवृन्द--(!) संस्थान का एक मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा जो संस्थान के निदेशक के रूप में पदाभिहित किया जाएगा और ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, संस्थान द्वारा नियुक्त किया जाएगा : परन्तु संस्थान का प्रथम निदेशक, केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।
- (2)निदेशक, संस्थान और शासी निकाय के सचिव के रूप में कार्य करेगा ।
- (3)निदेशक, उस तारीख से जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए या पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पद धारण करेगा ।
- (4)निदेशक ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं या जो उसे संस्थान या संस्थान के सभापति या शासी-निकाय या शासी-निकाय के अध्यक्ष द्वारा प्रत्यायोजित किए जाएं ।
- (5)ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, संस्थान उतने अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जितने उसकी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए आवश्यक हों और ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के पदनाम और श्रेणियां अवधारित कर सकेगा ।
- (6)ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, संस्थान के निदेशक तथा अन्य अधिकारी और कर्मचारी ऐसे वेतन और भत्तों के हकदार होंगे और छुट्टी, पेंशन, भविष्य-निधि और ऐसे अन्य विषयों के संबंध में सेवा की ऐसी शर्तों से शासित होंगे जो विनिर्दिष्ट की जाएं । 2. संस्थान के उद्देश्य--संस्थान के उद्देश्य निम्नलिखित होंगे-- (क) आयुर्विज्ञान शिक्षा की सभी शाखाओं में स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर शिक्षण की पद्धति को इस प्रकार विकसित करना कि आयुर्विज्ञान शिक्षा का एक ऊंचा स्तर निदर्शित हो; (ख) स्वास्थ्य क्रियाकलाप की सभी महत्वपूर्ण शाखाओं में कार्मिकों के प्रशिक्षण के लिए उच्चतम कोटि की शिक्षा सुविधाएं यथासाध्य एक स्थान पर एकत्र करना; और (ग) देश के लिए जितने विशेषज्ञों और आयुर्विज्ञान अध्यापकों की आवश्यकता है उसे पूरा करने के लिए स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना । 3. संस्थान के कृत्य--संस्थान, धारा 2 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों के संवर्धन की दृष्टि से-- (क) आधुनिक आयुर्विज्ञान तथा अन्य सहबद्ध विज्ञानों में, जिसके अंतर्गत भौतिक विज्ञान और जीव विज्ञान है, स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर शिक्षण की व्यवस्था कर सकेगा; (ख) ऐसे विज्ञानों की विभिन्न शाखाओं में अनुसंधान के लिए सुविधाएं प्रदान कर सकेगा; (ग) मानविकी के शिक्षण की व्यवस्था कर सकेगा; (घ) स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर, दोनों में आयुर्विज्ञान शिक्षा के संतोषप्रद स्तर प्राप्त करने के लिए आयुर्विज्ञान की नई पद्धतियों में प्रयोग कर सकेगा; (ड) स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर दोनों अध्ययनों के लिए पाठ्यक्रम और पाट्यचर्या विनिर्दिष्ट कर सकेगा; (च) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, निम्नलिखित की स्थापना और उन्हें बनाए रख सकेगा--
- (0)निवारक और सामाजिक आयुर्विज्ञान विभाग सहित विभिन्न विभागों वाले एक या अधिक आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, जिनमें विभिन्न विषयों पर न केवल स्नातकपूर्व आयुर्विज्ञान शिक्षा, किन्तु स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा प्रदान करने के लिए भी पर्याप्त कर्मचारी हों और जो इस निमित्त पर्याप्त रूप से सज्जित हों; (ऐ) एक या अधिक सुसज्जित अस्पताल; (ऐ) दंत चिकित्सा महाविद्यालय, जिसमें दंत चिकित्सा का अभ्यास करने के लिए और विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए ऐसी संस्थागत सुविधाएं हों, जो आवश्यक हों; (४) परिचर्या महाविद्यालय, जिसमें नसों को प्रशिक्षण देने के लिए पर्याप्त कर्मचारी हों और जो इसके लिए प्राप्त रूप से सज्जित हों; (५) ग्रामीण और शहरी स्वास्थ्य संगठन, जो संस्थान के आयुर्विज्ञान, दंत चिकित्सा और परिचर्या के विद्यार्थियों को क्षेत्र प्रशिक्षण देने के लिए और साथ ही सामुदायिक, स्वास्थ्य समस्याओं में अनुसंधान करने के लिए केन्द्र के रूप में होंगे; और (५४) विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, जैसे भौतिक चिकित्सक, व्यावसायिक चिकित्सक, भेषजज्ञ, ओषधि विश्लेषक और विभिन्न प्रकार के चिकित्सा तकनीकियों के प्रशिक्षणार्थ अन्य संस्थाएं; (छ) भारत में विभिन्न आयुर्विज्ञान महाविद्यालयों से अध्यापकों का प्रशिक्षण; (ज) स्नातकपूर्व तथा स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा में परीक्षाएं संचालित करना और ऐसी उपाधियां, डिप्लोमा तथा विद्या संबंधी अन्य विशिष्ट उपाधियां और पदवियां देना जो विनियमों में अधिकथित की जाएं; (झ) आचार्य पद, उपाचार्य पद, प्राध्यापक पद और किसी अन्य पद को विनियमों के अनुसार संस्थित करना और उन पदों पर व्यक्तियों की नियुक्ति करना; (अ) सरकार से अनुदान प्राप्त करना तथा, यथास्थिति, संदाताओं, उपकारियों, वसीयतकर्ताओं या अंतरकों द्वारा, दान, संदान, उपकृतियां, वसीयतें तथा जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की संपत्ति के अंतरण प्राप्त करना; (ट) संस्थान की या उसमें निहित किसी संपत्ति के संबंध में ऐसी किसी रीति से कार्यवाही करना जो धारा 2 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए आवश्यक समझी जाए; (ठ) केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से ऐसी फीसों तथा अन्य प्रभारों की मांग करना और उन्हें प्राप्त करना, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं : परन्तु छात्रों द्वारा संदेय ऐसी फीसें और अन्य प्रभार किसी भी दशा में केन्द्रीय सरकार के किसी आयुर्विज्ञान संस्थान द्वारा विनिर्दिष्ट फीसों और अन्य प्रभारों से अधिक नहीं होंगे; (ड) संस्थान में स्नातकपूर्व पाठ्यक्रमों में प्रत्येक पचहत्तर स्थानों में से कम से कम बीस स्थान स्थानीय आवेदकों के लिए आरक्षित करना; (ढ) निर्धन रोगियों को उसी रीति में निःशुल्क उपचार प्रदान करना जो केन्द्रीय सरकार के किसी आयुर्विज्ञान संस्थान द्वारा प्रदान किया जा रहा है; (ण) अपने कर्मचारिवूंद के लिए आवासगूहों का निर्माण करना और ऐसे आवासगृहों को, ऐसे विनियमों के अनुसार जो इस निमित्त बनाए जाएं, कर्मचारिवृन्द को आवंटित करना; (त) केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, संस्थान की संपत्ति की प्रतिभूति पर धन उधार लेना; (थ) ऐसे अन्य सभी कार्य और बातें करना जो धारा 2 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए आवश्यक हों। 4. संपत्ति का निहित होना--जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी की संपत्तियां जो केन्द्रीय सरकार में निहित हैं, इस अधिनियम के प्रारंभ पर संस्थान में निहित हो जाएंगी । 5. संस्थान को संदाय--केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, संस्थान को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशि और ऐसी रीति से संदाय कर सकेगा जिसे वह सरकार इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए आवश्यक समझे । 6. संस्थान की निधि--(1) संस्थान ऐसी निधि रखेगा जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे-- (क) केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए सभी धन; (ख) संस्थान को प्राप्त सभी फीस तथा अन्य प्रभार; (ग) अनुदान, दान, संदान, उपकृति, वसीयत अथवा अंतरणों के रूप में संस्थान को प्राप्त सभी धन; और (घर) किसी अन्य रीति या किसी अन्य स्रोत से संस्थान को प्राप्त सभी धन ।
- (2)निधि में जमा किए गए सभी धन ऐसे बैंकों में जमा या ऐसी रीति से विनिहित किए जाएंगे जिसे संस्थान, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, विनिशिचत करे ।
- (3)निधि का उपयोजन, संस्थान के व्ययों की, जिनके अंतर्गत धारा 3 के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग और कृत्यों के निर्वहन में किए गए व्यय भी हैं, पूर्ति के लिए किया जाएगा । 7. संस्थान का बजट--संस्थान, प्रतिवर्ष आगामी वित्तीय वर्ष की बाबत एक बजट ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, तैयार करेगा जिसमें संस्थान की प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित किए जाएंगे और केन्द्रीय सरकार को उसकी उतनी प्रतियां भेजेगा, जितनी विहित की जाएं । 8. लेखा और संपरीक्षा--(1) संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलनपत्र भी हैं, ऐसे प्ररूप में, जो केन्द्रीय सरकार नियमों द्वारा विहित करे और ऐसे साधारण निदेशों के अनुसार तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार भारत के नियंत्रक-महालेखापरी क्षक के परामर्श से जारी करे ।
- (2)संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा किया गया कोई भी व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरी क्षक को संदेय होगा ।
- (3)भारत के नियंत्रक-महालेखापरी क्षक के और संस्थान के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के ऐसी संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियां, लेखा, संबद्ध वाउचर तथा अन्य दस्तावेजों और कागज-पत्रों को पेश किए जाने की मांग करने तथा संस्थान के कार्यालयों और उसके द्वारा स्थापित और अनुरक्षित की गई संस्थाओं के कार्यालयों का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
- (4)भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथा प्रमाणित संस्थान के लेखे, उनकी संपरी क्षा रिपोर्ट सहित, प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी । 9. वार्षिक रिपोर्ट--संस्थान प्रत्येक वर्ष के लिए, उस वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों के संबंध में एक रिपोर्ट तैयार करेगा और उस रिपोर्ट को ऐसे प्ररूप में तथा ऐसी तारीख को या उसके पूर्व, जो विहित की जाए, केन्द्रीय सरकार को भेजेगा और इस रिपोर्ट की एक प्रति उसकी प्राप्ति के एक मास के भीतर संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी । 20. पेंशन और भविष्य निधि--(1) संस्थान अपने अधिकारियों, अध्यापकों तथा अन्य कर्मचारियों के फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसी पेंशन और भविष्य निधियां स्थापित करेगा, जो वह ठीक समझे ।
- (2)जहां ऐसी कोई पेंशन या भविष्य निधि स्थापित की गई है, वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषणा कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 925 (925 का 9) के उपबंध उस निधि को वैसे ही लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि हो । 2. संस्थान के आदेशों और लिखतों का अधिप्रमाणन--संस्थान के सभी आदेश और विनिश्चय निदेशक या इस निमित्त संस्थान द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे और अन्य सभी लिखतें ऐसे अधिकारियों के, जो संस्थान द्वारा प्राधिकृत किए जाएं, हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी । 22. रिक्तियों, आदि से कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना--संस्थान, शासी-निकाय या किसी अन्य स्थायी या तदर्थ समिति द्वारा इस अधिनियम के अधीन किया गया कोई कार्य या की गई कोई कार्यवाही केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि संस्थान, शासी-निकाय या ऐसी किसी स्थायी या तदर्थ समिति में कोई रिक्ति थी या उसके गठन में कोई त्रुटि थी । 23. संस्थान द्वारा आयुर्विज्ञान उपाधियां, डिप्लोमा, आदि का प्रदान किया जाना--तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को इस अधिनियम के अधीन आयुर्विज्ञान, दन्त, नर्स उपाधियां, डिप्लोमा और विद्या संबंधी अन्य विशिष्ट उपाधियां और पदवियां प्रदान करने की शक्ति होगी । 24. संस्थान द्वारा प्रदत्त आयुर्विज्ञान अहताओं की मान्यता--भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 956 (956 का 02), दन्त चिकित्सक अधिनियम, 948 (948 का 6) और भारतीय नर्स परिषद् अधिनियम, 947 (947 का 48) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन संस्थान द्वारा प्रदत्त आयुर्विज्ञान उपाधियां और डिप्लोमा, दन्त उपाधियां और नर्स उपाधियां पूर्वोक्त अधिनियमों के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त आयुर्विज्ञान अर्हताएं होंगी और संबंधित अधिनियमों की अनुसूचियों में सम्मिलित की गई समझी जाएंगी । 25. केन्द्रीय सरकार द्वारा नियंत्रण--संस्थान ऐसे निदेशों का पालन करेगा जो इस अधिनियम के दक्ष प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे समय-समय पर जारी किए जाएं । | 26. मतभेदों का समाधान--यदि संस्थान द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों का निर्वहन करने में या उसके संबंध में, संस्थान और केन्द्रीय सरकार के बीच कोई विवाद उद्भूत होता है तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा । 27. विवरणियां और जानकारी--संस्थान केन्द्रीय सरकार को ऐसी रिपोर्टे, विवरणियां और अन्य जानकारी देगा जिसकी वह सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे । 28. विद्यमान कर्मचारियों की सेवा का अंतरण--(1) इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से ही, उस तारीख से पूर्व, जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी में पदधारण करने वाला प्रत्येक कर्मचारी संस्थान में उस पद को उसी अवधि तक और सेवा के उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर, जिनके अन्तर्गत पारिश्रमिक, छुट्टी, भविष्य निधि, सेवा-निवृत्ति और अन्य सेवान्त फायदे भी हैं, धारण करेगा, जो वह ऐसा पद तब धारण करता जब यह अधिनियम पारित न हुआ होता और वह संस्थान के कर्मचारी के रूप में, इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से '[साढ़े तीन वर्ष की अवधि के लिए तब तक पदधारण करता रहेगा, जब तक कि वह उक्त [साढ़े तीन वर्ष] की अवधि के भीतर संस्थान का कर्मचारी न होने का विकल्प नहीं देता है या जब तक उसकी पदावधि, पारिश्रमिक या सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में विनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तन नहीं कर दिया जाता : शूपरन्तु ऐसे कर्मचारी, जिन्होंने जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी (संशोधन) अधिनियम, 207] के प्रवृत्त होने की तारीख को, यथास्थिति, अपने विकल्प का प्रयोग किया है या नहीं किया है और संस्थान से स्थानांतरित नहीं हुए हैं, विनिर्दिष्ट अवधि से पूर्व नए सिरे से अपने विकल्प का प्रयोग कर सकेंगे : परन्तु यह और कि] जवाहरलाल स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, पुडुचेरी के ऐसे अधिकारी, जो केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा के हैं और जो संस्थान के कर्मचारी होने का विकल्प देता है, तो उनकी नियुक्ति, वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निवंधन और शर्तें वह होंगी जो विहित की जाएं ।
- (2)ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर संस्थान का कर्मचारी न होने का विकल्प देता है, ऐसे नियमों और आदेशों द्वारा शासित होगा जो केन्द्रीय सरकार के समतुल्य पंक्ति के अधिकारियों और कर्मचारियों को लागू होते हैं ।
- (3)इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए संस्थान के किसी कर्मचारी की पदावधि, पारिश्रमिक और सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में, जिसके अन्तर्गत पेंशन भी है, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना, उसके लिए कोई अलाभकर परिवर्तन नहीं किया जाएगा। 29. नियम बनाने की शक्ति--(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, संस्थान से परामर्श के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी : परन्तु इस धारा के अधीन पहली बार नियम बनाते समय संस्थान से परामर्श करना आवश्यक नहीं होगा, किन्तु केन्द्रीय सरकार, ऐसे किन्हीं सुझावों पर विचार करेगी जो संस्थान उन नियमों के बनाए जाने के पश्चात् उनमें कोई संशोधन किए जाने के संबंध में दे ।
- (2)विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इन नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्:-- (क) धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (अ) और खंड (ट) के अधीन सदस्यों के नामनिर्देशन की रीति; (ख) धारा 6 की उपधारा (8) के अधीन रिक्तियां भरने की रीति; (ग) धारा 7 के अधीन संस्थान के सभापति द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां और निर्वहन किए जाने वाले कृत्य; (घ) धारा 8 के अधीन संस्थान के सभापति और अन्य सदस्यों को दिए जाने वाले भत्ते; (ड) धारा 0 की उपधारा (5) के अधीन स्थायी और तदर्थ समितियों के गठन के संबंध में नियंत्रण और निर्बन्धन; (च) धारा के अधीन संस्थान द्वारा नियुक्त संस्थान के निदेशक और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों की पदावधि, वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें; (छ) वह प्ररूप जिसमें और वह समय जब धारा 7 के अधीन संस्थान द्वारा बजट तथा रिपोर्टे तैयार की जाएंगी; (ज) धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन लेखाओं के वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलनपत्र भी है, का प्ररूप; (झ) धारा 9 के अधीन वार्षिक रिपोर्ट का प्ररूप; (अ) कोई अन्य विषय जिसे नियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जाए । ' 20| के अधिनियम सं० 0 की धारा 2 द्वारा (27-8-20 से) “एक वर्ष” के स्थान पर प्रतिस्थापित । 2 207। के अधिनियम सं० 0 की धारा 2 द्वारा (27-8-20 से) “परन्तु” के स्थान पर प्रतिस्थापित । प्र 30. विनियम बनाने की शक्ति--(1) संस्थान इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यात्वित करने के लिए विनियम, जो इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत हों, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगा और इस शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम निम्नलिखितत के लिए उपबंध कर सकेंगे-- (क) धारा 9 के अधीन संस्थान के अधिवेशनों का पहले अधिवेशन को छोड़कर, बुलाया जाना तथा आयोजित किया जाना, वह समय और स्थान जहां ऐसे अधिवेशन किए जाने हैं और ऐसे अधिवेशनों में कार्य संचालन; (ख) धारा 0 के अधीन शासी-निकाय और स्थायी तथा तदर्थ समितियों के गठन की रीति, उसकी पदावधि और उनमें रिक्तियों को भरने की रीति, सदस्यों को संदाय किए जाने वाले भत्ते और शासी-निकाय; स्थायी तथा तदर्थ समितियों द्वारा उनके कार्य संचालन, उनकी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया; (ग) धारा । की उपधारा (3) और उपधारा (4) के अधीन संस्थान के निदेशक और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों की शक्तियां और कर्तव्य तथा उपधारा (5) के अधीन सेवा की अन्य शर्तें; (व) (1) स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर अध्ययनों के लिए पाठ्यक्रम और पाठ्यचर्या विनिर्दिष्ट करने;
- (1)खंड (ज) के अधीन परीक्षा संचालित करने और उपाधियां, डिप्लोमा और विद्या संबंधी अन्य सम्मान और पदवियां देने; (पा) आचार्य पद, उपाचार्य पद, प्राध्यापक पद और अन्य पद जो संस्थित किए जाएं और वे व्यक्ति जिन्हें खंड (झ) के अधीन ऐसे पदों पर नियुक्त किया जा सकेगा, विनिर्दिष्ट करने; (५) खंड (ट) के अधीन संस्थान की संपत्तियों के प्रबंध विनिर्दिष्ट करने; (५) खंड (ठ) के अधीन संस्थान द्वारा मांगी और प्राप्त की जा सकने वाली फीसों और अन्य प्रभारों को विनिर्दिष्ट करने के लिए धारा 3 के अधीन संस्थान की शक्तियां; (ड) वह रीति जिससे और वे शर्ते जिनके अधीन रहते हुए धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन संस्थान के अधिकारियों, अध्यापकों तथा अन्य कर्मचारियों के फायदे के लिए पेंशन या भविष्य निधि स्थापित की जा सकेगी; (च) कोई अन्य विषय जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन किन््हीं विनियमों द्वारा उपबंध किया जा सकेगा ।
- (2)उपधारा (1) में किसी बात के होते भी, इस अधिनियम के अधीन प्रथम विनियम केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए जाएंगे और इस प्रकार बनाए गए किसी विनियम को संस्थान, उपधारा (1) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, परिवर्तित या विखंडित कर सकेगा । 3. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना--इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा । 32. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति--(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसा उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों : परंतु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
- (2)इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।