Section 21 of The British India Corporation Limited (Acquisition of Shares) Act, 1981 in hindi
असंवितरित या दावा न की गई रकम का साधारण राजस्व खाते में जमा किया जाना
आयुक््त को संदत्त कोई धन, जो उस तारीख से ठीक पूर्ववर्ती तारीख को, जिसको आयुक्त के कार्यालय का अंतिम रूप से परिसमापन होता है, असंवितरित रहता है या जिसके बारे में उस तारीख को कोई दावा नहीं किया गया है, उसको कार्यालय के अंतिम रूप से परिसमापन से पूर्व केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते को अंतरित किया जाएगा किन्तु इस प्रकार अंतरित किसी धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकता है और उसके संबंध में कार्यवाही इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अंतरण किया ही नहीं गया था और दावे के संदाय के लिए आदेश, यदि कोई हो, राजस्व के प्रतिदाय के लिए आदेश माना जाएगा ।
3. निरीक्षण करने की शक्ति--इस बात को अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि इस अधिनियम के अधीन संदाय के लिए दावा करने वाला व्यक्ति शेयर धारक है या नहीं, आयुक्त को अधिकार होगा कि वह--
(क) किसी व्यक्ति से, जिसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में कंपनी का कोई रजिस्टर या अभिलेख है, ऐसे रजिस्टर या अभिलेख को आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए अपेक्षा करे,
(ख) किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करे कि वह ऐसा कोई कथन करे या ऐसी कोई जानकारी प्रस्तुत करे जो आयुक्त द्वारा अपेक्षित हो ।
4. रकम के बारे में विवादों की जांच करने की आयुक्त की शक्ति--जहां इस अधिनियम के अधीन संदेय किसी रकम के लिए हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों के बारे में कोई विवाद है (इसके अन्तर्गत ऐसा कोई विवाद भी है कि रकम के बारे में किसी मृत दावेदार के विधिक प्रतिनिधि कौन हैं), वहां आयुक्त ऐसी जांच करने के पश्चात् जैसी वह उचित समझे ऐसे व्यक्ति को रकम का संदाय कर सकेगा जो उस रकम को प्राप्त करने के लिए उसे सर्वोत्तम हकदार प्रतीत होता है :
परन्तु यदि आयुक्त यह अवधारण करने में असमर्थ है कि रकम के लिए हकदार व्यक्ति कौन है और यह समझता है कि यह मामला उस आरंभिक अधिकारिता वाले प्रधान सिविल न्यायालय द्वारा समुचित रूप से निपटाया जा सकता है जिसकी स्थानीय सीमा के भीतर कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है, तो वह ऐसे विवाद को उक्त न्यायालय को निर्दिष्ट कर सकेगा जिसका विनिश्वय उस पर अंतिम होगा :
परंतु यह और कि इसमें अंतर्विष्ट किसी बात का प्रभाव ऐसे किसी व्यक्ति के, जो इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञात सम्पूर्ण रकम या उसका कोई भाग प्राप्त करे, उसके लिए विधिपूर्ण रूप से हकदार व्यक्ति को उसका संदाय करने के दायित्व पर नहीं होगा ।
5. न्यायालय में रकम का निक्षेप किया जाना--जहां कोई विवाद आयुक्त द्वारा धारा 4 के अधीन उसमें निर्दिष्ट सिविल न्यायालय को निर्दिष्ट किया गया है, वहां वह रकम का निक्षेप उस न्यायालय में करेगा ।
अध्याय 3 प्रकीर्ण
6. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना--इस अधिनियम के उपबंध इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि में, या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
7. शास्तियां--जो कोई व्यक्ति,--
(क) इस अधिनियम के अधीन ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या है या उसका कोई आधार नहीं है, या (ख) इस अधिनियम के अधीन ऐसा करने की अपेक्षा किए जाने पर,--
- (1)कंपनी का कोई रजिस्टर या अभिलेख पेश नहीं करेगा या पेश करने में असफल रहेगा ; या
- (1)कोई ऐसा कथन करेगा या कोई ऐसी सूचना देगा जिसकी कोई महत्वपूर्ण विशिष्टि मिथ्या है और जिसका मिथ्या होना वह जानता है या जिसके मिथ्या होने का वह विश्वास करता है या जिसके सही होने का वह विश्वास नहीं करता है ; या (ग) किसी पुस्तक, लेखा, अभिलेख, रजिस्टर, विवरणी या अन्य दस्तावेज में यथा पूर्वोक्त कोई कथन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा । 8. कंपनियों द्वारा अपराध--(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे : परंतु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
- (2)उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा । स्पष्टीकरण--इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-- (क) “कंपनी” से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा (ख) फर्म के संबंध में “निदेशक” से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है । 9. अपराधों के संज्ञान की परिसीमा--कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, केन्द्रीय सरकार या इस निमित्त उस सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा । | 20. नियम बनाने की शक्ति--(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
- (2)इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक््त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा । 2. निरसन और व्यावृत्ति--(1) ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन (शेयरों का अर्जन) अध्यादेश, 98। (98] का 5) इसके द्वारा निरसित किया जाता है।
- (2)ऐसे निरसन के होते हुए भी, इस प्रकार निरसित अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।